तेरी परछाई


आज घर आई
, तेरी परछाई

बातें सुनाईं, यादें दिखाईं

 

बाहों में जकड़के, मुझ को कैद करके

थामे जो कलाई, मांगे है रिहाई

आज घर आई, तेरी परछाई

 

वादे सब झूटे, चूड़ियों से टूटे,

तेरी जो कलाई, गैर ने सजाई

आज घर आई, तेरी परछाई

 

हाथों की लकीरें, काटे नस धीरे

देख ये कलाई, रोई परछाई

आज घर आई, तेरी परछाई

 

निहित कौल गर्द

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आरज़ू

है मेरी यह आरज़ू
बैठी हो तू रूबरू
कर रहे हम गुफ्तगू
नज़रों में हो तू ही तू,
आरज़ू, रूबरू, गुफ्तगू, तू ही तू
है मेरी यह आरज़ू

 

ज़िंदगी के मोड पर,
बोलो मिलोगी छोड़कर,
दिल की डोरी, माँ की लोरी,
रिश्ते-नाते तोड़ कर
है मेरी यह आरज़ू

 

साथ में लेंगे कदम
साथ में झेलेंगे गम
चोट खाएँगे, कराहेंगे,
लगाएंगे मरहम
है मेरी यह आरज़ू

 

चार पल की ज़िंदगानी
पाएगी अपनी निशानी
गोद में जो, सो रही हो,
नन्ही सी परियों की रानी
है मेरी यह आरज़ू

 

मौत का होगा जो डर,
कांधे पे तेरे रख़ के सर
मुसकुराते, गुनगुनाते,
जाएँगे तब हम उधर
है मेरी यह आरज़ू

 

– निहित कौल ‘गर्द’

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एहसास पाएँ

रिश्ते निचोड़े, राहों को मोड़े

गाने कुछ गायें, एहसास पाएँ

खुद को झिंझोड़ें, कसमों को तोड़ें

फिर गुनगुनाएँ, एहसास पाएँ

 

        भूली सी यादों को, बचपन के वादों को,

        टूटे इरादों को, फिर से बनाएँ

        एहसास पाएँ

 

हँसते थे रोते थे, दिन भर हम सोते थे

पैसे हम खोते थे, फिर से गुमाएँ,

एहसास पाएँ

 

        जिस पे हम मरते थे, मिलने से डरते थे

        इश्क़ भी करते थे, गले लगाएँ

        एहसास पाएँ

 

– निहित कौल ‘गर्द’

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छुआ जो तूने

छुआ जो तू, ने मुझे यूँ,

लागा कि ज्यूं, काँपा बदन

        कोने में जो, सोई थी वो,

        जागी है लो, फिर वो अगन

सच है क्या ये, तुम हो मेरे,

शाम ढले, घबराए मन

 

तन्हा थी मैं, वीरां थी मैं,

मैं न थी मैं, जो तू न था,

धुंदली थी मैं, उलझी थी मैं

सुलझी मैं तो, जो तू मिला

     छुआ जो तू, ने मुझे यूँ,

     लागा कि ज्यूं, काँपा बदन

 

तेरे बिना, मैं थी हिना

हाथों को थी, मैं ढूंडती

कोहरा हटा, रस्ता दिखा,

रिश्ता बना, अरपन हुई

     छुआ जो तू, ने मुझे यूँ,

     लागा कि ज्यूं, काँपा बदन

 

– निहित कौल ‘गर्द’

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फ़ासले

फासलों के दरमियान

खो गए हम तुम कहाँ

कह रही खामोशियाँ

जाएँ तो जाएँ अब कहाँ

 

साथ में थी, हाथ में थी, हर बात में थी

जो खुशी हर इक रात में थी, रूठ क्यों वो गईं

तेरी बाहे, जिन पे मरता था, वो निगाहें

साथ में चली थी जो वो राहें, छूट क्यों वो गई

 

सुन रहे अब दास्ताँ

आसुओं की ही ज़ुबान

छोड़ के हम दो जहाँ

जाएँ तो जाएँ अब कहाँ

 

सोचते हैं, पूछते हैं क्यों हम नोचते हैं,

एक दूजे को खरोंचते हैं, नरमियान क्यों नहीं

कहने को, ही है अब जिस्मों की लौ

हाथों में भी पहली सी वो, गर्मियाँ क्यों नहीं,

 

जल गया है आशियाँ

रेहता थे हम तुम जहां

है नहीं अब कुछ यहाँ

जाएँ तो जाएँ अब कहाँ

 

कहने दो, सहने दो, अब बहने दो,

तुम तो अब बस रहने दो, देख ली दोस्ती

प्यार थे, यार थे, दिलदार थे

एक दूजे की बहार थे, अब ख़िज़ाँ ही बची

 

छोड़ के अब कारवाँ

जाएंगे हम उस जहां

हो गए हम क्यों फना

जाएँ तो जाएँ अब कहाँ

 

– निहित कौल ‘गर्द’

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कुछ

मुख़्तलिफ़ रिश्ते हैं , दिलचस्प हैं, बेजान कुछ

थके हारे भी हैं, वाक़िफ भी हैं, अ‍नजान कुछ

 

कैसे  उम्मीद  करूं  उनसे मैं अपनों पै रहम

हम सभी में  छुपे बैठे हैं जब हैवान कुछ

 

चंद सिक्कों के लिये मैं ने बदल ड़ाले यक़ीं

बड़े सस्ते मैं बिके हैं मेरे ईमान कुछ

 

बड़ी मिन्नत से हुइ एक झलक मुझ को नसीब

बड़ी मुद्दत के बाद थे वह मेहरबान कुछ

 

दर पै नज़रें बिछाये “गर्द” ने दम तोड दिया

यूं ही कर के मेरे घर आयेंगे मेहमान कुछ

 

– निहित कौल ‘गर्द’

 

Translation

These relations are varied, some interesting, lifeless some,
Some are tired, some familiar and strangers some

How should I expect them to have mercy on my folks,
When in all of us, there sit hiding devils some

For a few coins I changed my convictions
For a pittance I have sold my beliefs some

It was after a lot of pleading that I was granted a glance
It was after eons that he was generous some

With his gaze on the doorstep, ‘Gard’ breathed his last
At least now, to my home will come, guests some

  • Nihit Kaul ‘Gard’

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क्या करूँ

रोज़ घुट घुट के मरूँ या एक दिन जी भर मरूँ
क्या करूँ मैं क्या करूँ मैं क्या करूँ मैं क्या करूँ

 

जल रहा है जो वो मेरा ही तो घर है, या नहीं
छोड़कर जिसको गए थे लौट आए फिर वहीं
चीख़ता है आसमां और चीख़ती है यह ज़मीं
चीख़ते हैं आंसूँ और अब चीख़ती है हर ख़ुशी

 

हम को देके घर निकाला, तुम भी देखो बट गए
काँगड़ी की आग हम सीने में सुलगाते रहे
मौत के ख़ूंख्वार साये यूं इधर बढ़ते रहे
भाई की जलती चिता पर मरसिया पढ़ते रहे

 

वादियों में गूँजती बीते दिनों की दास्ताँ
क़ब्र की जेलों में हैं लाशों के लाखों कारवाँ
हाथ में पत्थर है और आँखों में बदले का जुनूँ
कैसे फेंकूँ माँ पे यह पत्थर करूँ तो क्या करूँ

 

– निहित कौल ‘गर्द’

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