मुझ को


 

हवा सा तू है चारों सू मगर दिखता नहीं मुझ को

जो लौटा इब्तिदा पे मैं, मिला फिर तू वहीं मुझ को

 

करी मेरी खता जो माफ़ फिर काहे की मायूसी

तेरी आँखों में क्यूँ छुपति दिखी थोड़ी नमीं मुझ को

 

था सब कुछ पास मेरे फिर भी दिल प्यासा सा रहता था

तू है जब से मिला तब से नहीं कोई कमीं मुझ को

 

तेरे होने पे मैने उम्र भर शक की नज़र डाली

तुझे लगता है शायद मौत से होगा यकीन मुझ को

 

भटकती गर्द की ही लाश थी वो कब्र की भूखी

तेरे ही दर पे आके फिर मिली दो गज़ ज़मीन मुझ को

 

– निहित कौल ‘गर्द’

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नहीं

Dedicated to this famous ghazal by Bashir Badr

 

कोई हमसफ़र,कोई हमनशीं,कोई हमनफ़स,कोई हमयकीन,

मेरे पास लोग हज़ार थे, मेरे साथ कोई चला नहीं

 

कई ज़ख़्म जिनकी दवा नहीं, कई जुर्म जिनकी सज़ा नहीं

मुझे छोड़ के तू गया मगर, मुझे तुझसे कोई गिला नहीं

 

कभी पेड़ में, कभी शाख में, कभी जिस्म में, कभी राख में

उससे ढूंढ़ते,सभी दर ब दर, जो कभी किसी को मिला नहीं

 

वो जो सज संवर, बिन बात के, मेरे सामने, बेठा करें,

है ये साकिये का सितम नया, मुझे मै दिखा के पिला नहीं

 

नहीं आफ़ताब सा बेवफा, हर शाम घर से निकल गया,

है वो दिन में चाँद सा हमसफर, हुई रात पर वो ढला नहीं

 

उठा के गर्द को गोद में, ले गयी सबा सब छोड़ के

है ये आस अब हर साँस में, मिलेगा जिसमें मिला नहीं

 

– निहित कौल ‘गर्द’

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लेकिन

 

करी थी मैंने शब-ओ-रोज़ ये दुआ लेकिन

हुआ ना मुझसे मेरा हाल-ए-दिल बयान लेकिन

 

तेरी ज़ुल्फ़ों की छाओ में मिले दुनिया से नजात

ये ख्वाब ही सही है इसका आसरा लेकिन

 

हुए बिछड़े हमे बरसों तो क्यूँ तू अक्स में है

जुदा सही तू दिखे मुझ में है निहान लेकिन

 

बिताई उम्र बदलते हुए पिंजरे हमने

दिखा न क्यूँ हमे वो खाली आसमाँ लेकिन

 

सुना है गर्द का मकान है बड़ा आलीशाँ

तो क्यूँ भटक रहा है वो यहाँ वहाँ लेकिन

 

– निहित कौल ‘गर्द’

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गनीमत है

मौत से डरते हो क्यूँ नासाज़ तबीययत है

ज़िन्दगी जितनी मिली उतनी गनीमत है

 

शहर मे तेरे मुझे तो भीक भी मिलती नहीं

भीक है या ये कदंबोसी की कीमत है

 

बच्चियों को भी ये गिद अब नोच के हैं खा रहे

भूक ये नापाक सी, ये कैसी वहशत है

 

कत्ल करके मुझ पे ही तौहमत लगाते हैं

ये ज़लालत है मेरी या मेरी शोहरत है

 

गर्द के हर लफ्ज़ में कितने ही लम्हे क़ैद हैं

जो हुनर कहते हैं वो बरसों की मेहनत है

 

 

– निहित कौल ‘गर्द’

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नहीं लगता

 

ये कैसा जुर्म है, सज़ा के जो काबिल नहीं लगता

करे जो ख़ून अपना क्यों हमे क़ातिल नहीं लगता

 

वो जिसका हाथ थामे सैंकड़ों मीलों चला दरिया

मिला जा कर समुंदर से तो वो साहिल नहीं लगता

 

गया इक तू तो क्यूँ ख़ाली सा घर लगने लगा मुझको

वो सब जो पा चुका था मैं वो अब हासिल नहीं लगता

 

बेचारा दुश्मनों से था घिरा हथियार जब डाले

वो जब अपना ही बेटा हो तो वो बुज़दिल नहीं लगता

 

चलो ऐ गर्द अब चलने की तैयारी करें हम भी

कि इन दिलकश नज़ारों में भी अब ये दिल नहीं लगता

 

– निहित कौल ‘गर्द’

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आ जाओ

 

मुझपे थोड़ा सा करो और रहम आ जाओ

मेरे महबूब तुम्हें मेरी कसम आ जाओ

 

तेरे ज़ुल्मों की तो आदत सी हो गयी है हमे

आओ लो फ़िर से करो हम पे सितम आ जाओ

 

तेरी खुशबू से ही हर घाव को मरहम मिलता

यूं अकेले न भरेंगे ये ज़ख्म  आ जाओ

 

तुम नहीं आओगे अब तुम कभी न आओगे

दिल से मेरे ये मिटाने को वहम आ जाओ

 

‘गर्द’ के घर न सही कब्र पर तो आ जाओ

अब करो आखरी मुझपे ये करम आ जाओ

 

– निहित कौल ‘गर्द’

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नहीं हुआ


 

वो दिल का दर्द हाजत-ए-ज़ुबान नहीं हुआ

वो दर्द-ए-दिल दफ़न रहा फुगाँ नहीं हुआ

 

सुना है उनके रूठने में प्यार है बहुत

पता नहीं वो आज क्यों खफ़ा नहीं हुआ

  

कहा वो जो मेरे ज़हन में था तेरे लिए

मगर जो दिल में था वही बयां नहीं हुआ

 

वो चीज़ थी ऐसी की मैं वापस न कर सका

वो क़र्ज़ था ऐसा की वो अदा नहीं हुआ

 

हैरान मत हो गर्द ले तेरे भी घर जला

जो हो रहा है अब यहाँ कहाँ नहीं हुआ

 

– निहित कौल ‘गर्द’

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