बतानी है अभी

सोती यादों की शम्मा फिर से जलानी है अभी

खुद से जो बात छुपाई थी बतानी है अभी

 

ज़िन्दगी भर, मैंने डर कर, ही लिए अपने कदम

ज़ख़्म से पहले लगाया मैंने हर दम मरहम

खर्च साँसे तो बहुत की जिया पर मैं कम

दोनों हाथों से बची जान लुटानी है अभी

 

उम्र भर मैंने जमा कर के जहां भर के ख़िताब

अपने हाथों से पिलाई है अना को ये शराब

खोकले लफ़्ज़ों से भर दी मैंने जीवन की किताब

हाशियों में मुझे लिखनी ये कहानी है अभी

 

– निहित कौल ‘गर्द’

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हुज़ूर

पता है नाम मगर वो ‘हुज़ूर’ कहते हैं,
कि जो करीब हैं उसे वो दूर कहते हैं

 

झुकी नज़र से करें क़त्ल वो मगर फिर भी
उसी झुकी सी नज़र को शऊर कहते हैं

 

भले औलाद ने आँखों में धूल झौंकी हो,
मेरी आँखों का उसे फिर भी नूर कहते हैं

 

तुम्हारी उम्र में जो बोरीयत कहलाती है
हुमारी उम्र में आ कर सुरूर कहते हैं

 

तेरे बारे में गर्द वो भला कहें ना कहें
तेरे बारे में बुरा वो ज़रूर कहते हैं

 

– निहित कौल ‘गर्द’

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चल कर तो देखो

गर मोम हो तुम पिघल कर तो देखो

दो चार पल साथ चल कर तो देखो


गैरों को जो चाहते हो बदलना

अपने को पहले बदल कर तो देखो


मेरे लड्खाड़ने की तुम फ़िक्र छोड़ो

खुद ही गिर रहे हो संभल कर तो देखो


नाकामियों का तुम्हें खौफ़ क्यों है

गर फिर उभरना है ढल कर तो देखो


आशिक़ हो तो फिर मिटो गर्द जैसे

परवाने बन जाओ जल कर देखो


– निहित कौल ‘गर्द’

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बेकरार

मेरे माथे पे शिकन का ये भार रहता है

वो आ भी जाएँ घर तो इंतज़ार रहता है

 

खड़े लाशों के सुतूँ पर किया ऐलान शाह ने

हमारे मुल्क के हर घर में प्यार रहता है

 

करी जो सिर्फ़ वफ़ा तूने तो फिर देख हशर

जहाँ था प्यार बस अब एतबार रहता है

 

मेरी इस लाश को अब कब्र की नहीं हाजत

मेरे घर में ही अब मेरा मज़ार रहता है

 

कहाँ से लाएगा तू गर्द सुकून पल भर का

हर एक बात पे दिल बेकरार रहता है

 

– निहित कौल ‘गर्द’

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क्यों है

अब अक्स भी मेरा लगे मेहमान सा क्यों है

गर हमसफर है तू तो यूं अनजान सा क्यों है

       क्यूँ पूछते हो तुम जवाब जानते हो जब

       क्यूँ मार के कहो की तू बेजान सा क्यूँ है

अपने हैं साथ में मेरे रहते तो फिर भला

हर पहर ये घर मेरा सुनसान सा क्यों है

      रिश्तों में तकल्लुफ़ की दरारें हैं हर कहीं

      हर हक मेरा मुझको लगे एहसान सा क्यों हैं

कहता था सब से गर्द को तू भूल गया है

तो आज देख कर उसे हैरान सा क्यों है

– निहित कौल ‘गर्द’

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पर काट के

पर काट के मेरे मुझे लाचार कर दिया

पिंजरे को खोल के उसे मज़ार कर दिया

तुम से तो है अच्छी मेरी दुश्मन से गुफ़्तगू

नफ़रत का ही सही मगर, इज़हार कर दिया

ज़िन्दगी ने उम्र भर रखा गिरफ़्त में

हूई अज़ीज़ कैद जो, फरार कर दिया

दोनों जने इक माँ से तो क्यूँ एक भाई को

सरहद की इन लकीरों ने उस पार कर दिया

था गर्द दर्द में दफ़न, मरा पड़ा था गर्द,

पहचानने से तूने जो इन्कार कर दिया

– निहित कौल ‘गर्द’

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कुछ नहीं बाकी

कहें तो क्या कहें, कहने को कुछ नहीं बाकी,

सहेंगे और न, सहने को कुछ नहीं बाकी

वो गुड्डीया जो कि बात-बात पर भी रोती थी,

अब उसकी आँखों में, बहने को कुछ नहीं बाकी

मेरा बेटा गया, बेटी गयी, गयी उम्मीद

मेरे इस गाँव में, रहने को कुछ नहीं बाकी

तमाम ओर था सैलाब, पर महफ़ूज था गर्द,

डहा जो घर तो है, डहने को कुछ नहीं बाकी

– निहित कौल ‘गर्द’

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