आए कुछ


वो मुझे देख के महफ़िल में जो शरमाए कुछ
मुझ को दिन अपनी जवानी के वो याद आए कुछ
 
मुझ को दिखता नहीं तेरे सिवा कुछ भी साकी
तू पिलाए तो इन आँखों को नज़र आए कुछ
 
इक तरफ मैं हूँ जो कुछ भी नहीं कह पाता हूँ
इक तरफ वो हैं जो चुप रह के भी कह जाएँ कुछ
 
बेवफा तेरे खत जब भी जलाने चाहे
उन में लिपटी हुई मुझ को मिली वफाएँ कुछ
 
तेरा चेहरा भले ही वक़्त ने मिटा डाला
मुझे हैं याद पर अब भी तेरी अदाएं कुछ
 
कोई तो साथ में बैठे कोई तो बात करे
कोई तो हो जिसे हम हाल-ए-दिल सुनाएं कुछ
 
बिना साँसों के गर्द कैसे सुनाएगा ग़ज़ल 
तू मेरी कब्र पर आए तो हम फ़रमाएँ कुछ
 
 
– निहित कौल ‘गर्द’

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किस लिए


कहने को जब कुछ है नहीं, बातें बनाएँ किस लिए
अंधों के दिल बहलाने को बत्ती जलाएँ किस लिए
 
रोता मुझे अब देख कर, आता नहीं कोई इधर
फिर बेवजह बेवक्त हम आँसू बहाएँ किस लिए
 
जब है मुझे पूरा यकीन, ना इस मकान में है मकीन
तो रोज़ फिर मंदिर में जा घंटी बजाएं किस लिए
 
कहते है सब की भूल जा, गए वक्त की वो धूल था
करता है अब भी याद जो, उसको भुलाएँ किस लिए
 
ईंटों का जंगल है शहर, ना शाम है ना है सहर
तो छोड़ कर अपना वो घर, याँ घर बसाएँ किस लिए
 
पूरा शहर कहता यही, तुझसे है मेरी दिल्लगी
जो है पता सब को उसे, तुझसे छुपाएँ किस लिए
 
आँसू जो सब तेरे गिरे, वो गर्द ने लो पी लिए
मिलने को अब मैखाने में साकी से जाएँ किस लिए
 
 
– निहित कौल ‘गर्द’

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नहीं मिलता

मैं ढूंढता हूँ जिसे आज वो नहीं मिलता

मेरा ही अक्स है नाराज़ वो नहीं मिलता


मेरे सीने पे लगे ज़ख़्म दिखाऊँ किसको

कहीं बिछड़ा मेरा हमराज़ वो नहीं मिलता


मैं घोंसलों में सभी झाँक के आया हूँ मगर,

हमल में जिसकी थी परवाज़ वो नहीं  मिलता


तेरे जाने के बाद और भी पलकों पे रहे

तेरी अदा तेरा अंदाज़ वो नहीं मिलता


गर्द के जैसे ये अशआ’र भी बेज़ार लगें

वो जो माज़ी का था एजाज़ वो नहीं मिलता


– निहित कौल ‘गर्द’

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लगता है मुझे

 

 

ये मेरा अक्स परेशान सा लगता है मुझे

मेरा माज़ी गुमे सामान सा लगता है मुझे

 

 

एक बस तू ही नहीं, मैं नहीं वाकिफ़ जिस से,

शहर का शहर अब अनजान सा लगता है मुझे

 

 

ऐसे जाना की मेरी जान सारी तुझ में है

तेरे जाने पे सब बेजान सा लगता है मुझे

 

 

हर एक शख्स मुझे रेत के दाने सा दिखे

यह कारवाँ भी अब वीरान सा लगता है मुझे

 

 

वो पहला खत मेरा उसने मुझे लौटा ही दिया

चलो अब लौटना आसान सा लगता है मुझे

 

 

गुलामी गर्द को इतनी अज़ीज़ हो बैठी

की हर सवाल भी फ़रमान सा लगता है मुझे

 

 

 

– निहित कौल ‘गर्द’

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याद भी आते नहीं

 

कह दिया मैंने की तुम अब याद भी आते नहीं
दर्द तो होता है पर हम ज़ख़्म दिखाते नहीं

 

ज़िंदगी बाज़ार है मिलते हैं बस शिकवे-गिले
पूछते हो तुम की क्यूँ बाज़ार हम जाते नहीं

 

कल जिन्हें पलकों पे रख कर घूमते थे दर-ब-दर,
देख के आता मुझे नज़रें भी मिलाते नहीं

 

तू गया जो छोड़ कर मैंने जला डाला था घर,
हम किसी बिन बात के यूँ जशन मनाते नहीं

 

साँस है तू गर्द की, वो मर रहा तेरे बिना,
जानते हो जब, तो क्यूँ, घर पे मेरे आते नहीं

 

– निहित कौल ‘गर्द’

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चलने से पहले

रात यह सुनसान सी आई है दिन ढलने से पहले
आ गये मंज़िल पे हम पहला कदम चलने से पहले

ख़ौफ़ की आँधी चली, है कांपती हर इक कली,
ओड़ती है ओस की चादर वो अब खिलने से पहले

क्या हशर है शहर का, कितना है आलस हर तरफ़,
पूछते हैं दाम हम हिलने का अब हिलने से पहले

मर के भी उसने नहीं जीने दिया मुझको कभी,
कब्र पर आकर कुरेदे ज़ख़्म सब सिलने से पहले

गर्द है गर्दिश में पर अब गम के गश में वो नहीं,
ग़ज़ल के गिर्दाब में है, गर्द में मिलने से पहले

– निहित कौल ‘गर्द’

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बाँध दो रोटी

 

सुनो अब बाँध दो रोटी, मुसाफिर चलने वाला है

हुई अब धूप ये धुंधली की दिन अब ढलने वाला है

    

बड़े ज़ोरों से हँसता है, बहुत मायूस है शायद,

वो मेरा हम शकल मेरे ही घर में रहने वाला है

    

सभी ये पूछते इक दूसरे से, किस की गलती है,

ये सब करनी है उसकी, एक वो ही करने वाला है

 

निकाले आज फिर मैंने वो सारे काँच के प्याले,

सुबह से छत पे कौवे हैं, कोई तो आने वाला है

 

कि जितना भी है उस मे खुश रहो, बाकी का मत सोचो

वो जिस से जल रहे हो तुम, सुबह वो मरने वाला है

 

उस ही से है शिकायत गर्द को और इश्क भी उससे,

वो ही कातिल है मेरा और वो ही चाहने वाला है

 

– निहित कौल ‘गर्द’

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