चल कर तो देखो

गर मोम हो तुम पिघल कर तो देखो

दो चार पल साथ चल कर तो देखो


गैरों को जो चाहते हो बदलना

अपने को पहले बदल कर तो देखो


मेरे लड्खाड़ने की तुम फ़िक्र छोड़ो

खुद ही गिर रहे हो संभल कर तो देखो


नाकामियों का तुम्हें खौफ़ क्यों है

गर फिर उभरना है ढल कर तो देखो


आशिक़ हो तो फिर मिटो गर्द जैसे

परवाने बन जाओ जल कर देखो


– निहित कौल ‘गर्द’

Advertisements
Posted in Uncategorized | Leave a comment

बेकरार

मेरे माथे पे शिकन का ये भार रहता है

वो आ भी जाएँ घर तो इंतज़ार रहता है

 

खड़े लाशों के सुतूँ पर किया ऐलान शाह ने

हमारे मुल्क के हर घर में प्यार रहता है

 

करी जो सिर्फ़ वफ़ा तूने तो फिर देख हशर

जहाँ था प्यार बस अब एतबार रहता है

 

मेरी इस लाश को अब कब्र की नहीं हाजत

मेरे घर में ही अब मेरा मज़ार रहता है

 

कहाँ से लाएगा तू गर्द सुकून पल भर का

हर एक बात पे दिल बेकरार रहता है

 

– निहित कौल ‘गर्द’

Posted in Uncategorized | Leave a comment

क्यों है

अब अक्स भी मेरा लगे मेहमान सा क्यों है

गर हमसफर है तू तो यूं अनजान सा क्यों है

       क्यूँ पूछते हो तुम जवाब जानते हो जब

       क्यूँ मार के कहो की तू बेजान सा क्यूँ है

अपने हैं साथ में मेरे रहते तो फिर भला

हर पहर ये घर मेरा सुनसान सा क्यों है

      रिश्तों में तकल्लुफ़ की दरारें हैं हर कहीं

      हर हक मेरा मुझको लगे एहसान सा क्यों हैं

कहता था सब से गर्द को तू भूल गया है

तो आज देख कर उसे हैरान सा क्यों है

– निहित कौल ‘गर्द’

Posted in Uncategorized | Leave a comment

पर काट के

पर काट के मेरे मुझे लाचार कर दिया

पिंजरे को खोल के उसे मज़ार कर दिया

तुम से तो है अच्छी मेरी दुश्मन से गुफ़्तगू

नफ़रत का ही सही मगर, इज़हार कर दिया

ज़िन्दगी ने उम्र भर रखा गिरफ़्त में

हूई अज़ीज़ कैद जो, फरार कर दिया

दोनों जने इक माँ से तो क्यूँ एक भाई को

सरहद की इन लकीरों ने उस पार कर दिया

था गर्द दर्द में दफ़न, मरा पड़ा था गर्द,

पहचानने से तूने जो इन्कार कर दिया

– निहित कौल ‘गर्द’

Posted in Uncategorized | Leave a comment

कुछ नहीं बाकी

कहें तो क्या कहें, कहने को कुछ नहीं बाकी,

सहेंगे और न, सहने को कुछ नहीं बाकी

वो गुड्डीया जो कि बात-बात पर भी रोती थी,

अब उसकी आँखों में, बहने को कुछ नहीं बाकी

मेरा बेटा गया, बेटी गयी, गयी उम्मीद

मेरे इस गाँव में, रहने को कुछ नहीं बाकी

तमाम ओर था सैलाब, पर महफ़ूज था गर्द,

डहा जो घर तो है, डहने को कुछ नहीं बाकी

– निहित कौल ‘गर्द’

Posted in Uncategorized | Leave a comment

अँधेरा

अँधेरा गले मिल के रोता है मुझसे

ये होने का नाटक, न होता है मुझसे

 

जो भाई ने मुझको दी गाली कभी

कानों ने निघली वो चुभती नहीं

            कहूँ क्या मैं उस्से वो छोटा है मुझसे

 

वो बाबूजी जो रोज़ बटवा गुमाते,

वही अब मुझे हैं बहुत याद आते,

           जो चशमा कभी मेरा खोता है मुझसे

 

वो बेटे का चेहरा वो आंखे  निराली

उसी मूह पे हाथों से है ख़ाक डाली

           हाथों से पौदा न बोता है मुझसे

 

– निहित कौल ‘गर्द’

Posted in Uncategorized | Leave a comment

तेरी परछाई


आज घर आई
, तेरी परछाई

बातें सुनाईं, यादें दिखाईं

 

बाहों में जकड़के, मुझ को कैद करके

थामे जो कलाई, मांगे है रिहाई

आज घर आई, तेरी परछाई

 

वादे सब झूटे, चूड़ियों से टूटे,

तेरी जो कलाई, गैर ने सजाई

आज घर आई, तेरी परछाई

 

हाथों की लकीरें, काटे नस धीरे

देख ये कलाई, रोई परछाई

आज घर आई, तेरी परछाई

 

निहित कौल गर्द

Posted in Hindi - Urdu | Leave a comment