लगता है मुझे

 

 

ये मेरा अक्स परेशान सा लगता है मुझे

मेरा माज़ी गुमे सामान सा लगता है मुझे

 

 

एक बस तू ही नहीं, मैं नहीं वाकिफ़ जिस से,

शहर का शहर अब अनजान सा लगता है मुझे

 

 

ऐसे जाना की मेरी जान सारी तुझ में है

तेरे जाने पे सब बेजान सा लगता है मुझे

 

 

हर एक शख्स मुझे रेत के दाने सा दिखे

यह कारवाँ भी अब वीरान सा लगता है मुझे

 

 

वो पहला खत मेरा उसने मुझे लौटा ही दिया

चलो अब लौटना आसान सा लगता है मुझे

 

 

गुलामी गर्द को इतनी अज़ीज़ हो बैठी

की हर सवाल भी फ़रमान सा लगता है मुझे

 

 

 

– निहित कौल ‘गर्द’

Advertisements
Posted in Hindi - Urdu | Leave a comment

याद भी आते नहीं

 

कह दिया मैंने की तुम अब याद भी आते नहीं
दर्द तो होता है पर हम ज़ख़्म दिखाते नहीं

 

ज़िंदगी बाज़ार है मिलते हैं बस शिकवे-गिले
पूछते हो तुम की क्यूँ बाज़ार हम जाते नहीं

 

कल जिन्हें पलकों पे रख कर घूमते थे दर-ब-दर,
देख के आता मुझे नज़रें भी मिलाते नहीं

 

तू गया जो छोड़ कर मैंने जला डाला था घर,
हम किसी बिन बात के यूँ जशन मनाते नहीं

 

साँस है तू गर्द की, वो मर रहा तेरे बिना,
जानते हो जब, तो क्यूँ, घर पे मेरे आते नहीं

 

– निहित कौल ‘गर्द’

Posted in Hindi - Urdu | Leave a comment

चलने से पहले

रात यह सुनसान सी आई है दिन ढलने से पहले
आ गये मंज़िल पे हम पहला कदम चलने से पहले

ख़ौफ़ की आँधी चली, है कांपती हर इक कली,
ओड़ती है ओस की चादर वो अब खिलने से पहले

क्या हशर है शहर का, कितना है आलस हर तरफ़,
पूछते हैं दाम हम हिलने का अब हिलने से पहले

मर के भी उसने नहीं जीने दिया मुझको कभी,
कब्र पर आकर कुरेदे ज़ख़्म सब सिलने से पहले

गर्द है गर्दिश में पर अब गम के गश में वो नहीं,
ग़ज़ल के गिर्दाब में है, गर्द में मिलने से पहले

– निहित कौल ‘गर्द’

Posted in Hindi - Urdu | Leave a comment

बाँध दो रोटी

 

सुनो अब बाँध दो रोटी, मुसाफिर चलने वाला है

हुई अब धूप ये धुंधली की दिन अब ढलने वाला है

    

बड़े ज़ोरों से हँसता है, बहुत मायूस है शायद,

वो मेरा हम शकल मेरे ही घर में रहने वाला है

    

सभी ये पूछते इक दूसरे से, किस की गलती है,

ये सब करनी है उसकी, एक वो ही करने वाला है

 

निकाले आज फिर मैंने वो सारे काँच के प्याले,

सुबह से छत पे कौवे हैं, कोई तो आने वाला है

 

कि जितना भी है उस मे खुश रहो, बाकी का मत सोचो

वो जिस से जल रहे हो तुम, सुबह वो मरने वाला है

 

उस ही से है शिकायत गर्द को और इश्क भी उससे,

वो ही कातिल है मेरा और वो ही चाहने वाला है

 

– निहित कौल ‘गर्द’

Posted in Hindi - Urdu | Leave a comment

मुझ को


 

हवा सा तू है चारों सू मगर दिखता नहीं मुझ को

जो लौटा इब्तिदा पे मैं, मिला फिर तू वहीं मुझ को

 

करी मेरी खता जो माफ़ फिर काहे की मायूसी

तेरी आँखों में क्यूँ छुपति दिखी थोड़ी नमीं मुझ को

 

था सब कुछ पास मेरे फिर भी दिल प्यासा सा रहता था

तू है जब से मिला तब से नहीं कोई कमीं मुझ को

 

तेरे होने पे मैने उम्र भर शक की नज़र डाली

तुझे लगता है शायद मौत से होगा यकीन मुझ को

 

भटकती गर्द की ही लाश थी वो कब्र की भूखी

तेरे ही दर पे आके फिर मिली दो गज़ ज़मीन मुझ को

 

– निहित कौल ‘गर्द’

Posted in Hindi - Urdu | Leave a comment

नहीं

Dedicated to this famous ghazal by Bashir Badr

 

कोई हमसफ़र,कोई हमनशीं,कोई हमनफ़स,कोई हमयकीन,

मेरे पास लोग हज़ार थे, मेरे साथ कोई चला नहीं

 

कई ज़ख़्म जिनकी दवा नहीं, कई जुर्म जिनकी सज़ा नहीं

मुझे छोड़ के तू गया मगर, मुझे तुझसे कोई गिला नहीं

 

कभी पेड़ में, कभी शाख में, कभी जिस्म में, कभी राख में

उससे ढूंढ़ते,सभी दर ब दर, जो कभी किसी को मिला नहीं

 

वो जो सज संवर, बिन बात के, मेरे सामने, बेठा करें,

है ये साकिये का सितम नया, मुझे मै दिखा के पिला नहीं

 

नहीं आफ़ताब सा बेवफा, हर शाम घर से निकल गया,

है वो दिन में चाँद सा हमसफर, हुई रात पर वो ढला नहीं

 

उठा के गर्द को गोद में, ले गयी सबा सब छोड़ के

है ये आस अब हर साँस में, मिलेगा जिसमें मिला नहीं

 

– निहित कौल ‘गर्द’

Posted in Uncategorized | Leave a comment

लेकिन

 

करी थी मैंने शब-ओ-रोज़ ये दुआ लेकिन

हुआ ना मुझसे मेरा हाल-ए-दिल बयान लेकिन

 

तेरी ज़ुल्फ़ों की छाओ में मिले दुनिया से नजात

ये ख्वाब ही सही है इसका आसरा लेकिन

 

हुए बिछड़े हमे बरसों तो क्यूँ तू अक्स में है

जुदा सही तू दिखे मुझ में है निहान लेकिन

 

बिताई उम्र बदलते हुए पिंजरे हमने

दिखा न क्यूँ हमे वो खाली आसमाँ लेकिन

 

सुना है गर्द का मकान है बड़ा आलीशाँ

तो क्यूँ भटक रहा है वो यहाँ वहाँ लेकिन

 

– निहित कौल ‘गर्द’

Posted in Uncategorized | Leave a comment