आ जाओ

 

मुझपे थोड़ा सा करो और रहम आ जाओ

मेरे महबूब तुम्हें मेरी कसम आ जाओ

 

तेरे ज़ुल्मों की तो आदत सी हो गयी है हमे

आओ लो फ़िर से करो हम पे सितम आ जाओ

 

तेरी खुशबू से ही हर घाव को मरहम मिलता

यूं अकेले न भरेंगे ये ज़ख्म  आ जाओ

 

तुम नहीं आओगे अब तुम कभी न आओगे

दिल से मेरे ये मिटाने को वहम आ जाओ

 

‘गर्द’ के घर न सही कब्र पर तो आ जाओ

अब करो आखरी मुझपे ये करम आ जाओ

 

– निहित कौल ‘गर्द’

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नहीं हुआ


 

वो दिल का दर्द हाजत-ए-ज़ुबान नहीं हुआ

वो दर्द-ए-दिल दफ़न रहा फुगाँ नहीं हुआ

 

सुना है उनके रूठने में प्यार है बहुत

पता नहीं वो आज क्यों खफ़ा नहीं हुआ

  

कहा वो जो मेरे ज़हन में था तेरे लिए

मगर जो दिल में था वही बयां नहीं हुआ

 

वो चीज़ थी ऐसी की मैं वापस न कर सका

वो क़र्ज़ था ऐसा की वो अदा नहीं हुआ

 

हैरान मत हो गर्द ले तेरे भी घर जला

जो हो रहा है अब यहाँ कहाँ नहीं हुआ

 

– निहित कौल ‘गर्द’

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कुछ ज़ख्म

क्यूँ तुम पे अब भी यूँ मरता है दिल

कुछ ज़ख्म भरने से डरता है दिल

 

जाना कि जब तुम भी महफ़िल में होगे

मन ही ये मन में सँवरता है दिल

 

करूँ जब भी कोशिश मैं तुम को भुलाने की

मुझको ही मेरा अखरता है दिल

 

मोहब्बत करी वो भी कातिल से अपने

जाने ये क्यों ऐसा करता है दिल

 

ख़्वाबों में हम तुम उड़े बादलों में

अब न ज़मीं पे उतरता है दिल

 

खो जाऊँ अब मैं निहाँ तुझ में हो जाऊँ

दिल से गुज़ारिश ये करता है दिल

 

देखा तुझे जब तो रोने लगा गर्द

आँखों में क्यों गर्द भर्ता है दिल

 

– निहित कौल ‘गर्द’

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नज़र आता नहीं

हाथ में जो है वो मैं ढूँढूं तो क्यों पाता नहीं

देखता तो हूँ तुझे पर तू नज़र आता नहीं

 

था अकेला ही भला, प्यारा मुझे था हर कोई

भीड़ में हूँ अब मगर कोइ मुझे भाता नहीं

 

क्या मैं समझाता तुझे की क्यों हूँ यूं बेताब सा

तुम जो आते हो तो फिर कुछ भी समझ आता नहीं

 

है मुझे एहसास अब कि मैं  पुराना हो गया

गीत जो गाता हूँ मैं वो कोई भी गाता नहीं

 

गर्द ने साबित किया लो झूठ कहते थे सभी

कि दर से तेरे लौट के रुसवा कोई जाता नहीं

 

– निहित कौल ‘गर्द’

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बतानी है अभी

सोती यादों की शम्मा फिर से जलानी है अभी

खुद से जो बात छुपाई थी बतानी है अभी

 

ज़िन्दगी भर, मैंने डर कर, ही लिए अपने कदम

ज़ख़्म से पहले लगाया मैंने हर दम मरहम

खर्च साँसे तो बहुत की जिया पर मैं कम

दोनों हाथों से बची जान लुटानी है अभी

 

उम्र भर मैंने जमा कर के जहां भर के ख़िताब

अपने हाथों से पिलाई है अना को ये शराब

खोकले लफ़्ज़ों से भर दी मैंने जीवन की किताब

हाशियों में मुझे लिखनी ये कहानी है अभी

 

– निहित कौल ‘गर्द’

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हुज़ूर

पता है नाम मगर वो ‘हुज़ूर’ कहते हैं,
कि जो करीब हैं उसे वो दूर कहते हैं

 

झुकी नज़र से करें क़त्ल वो मगर फिर भी
उसी झुकी सी नज़र को शऊर कहते हैं

 

भले औलाद ने आँखों में धूल झौंकी हो,
मेरी आँखों का उसे फिर भी नूर कहते हैं

 

तुम्हारी उम्र में जो बोरीयत कहलाती है
हुमारी उम्र में आ कर सुरूर कहते हैं

 

तेरे बारे में गर्द वो भला कहें ना कहें
तेरे बारे में बुरा वो ज़रूर कहते हैं

 

– निहित कौल ‘गर्द’

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चल कर तो देखो

गर मोम हो तुम पिघल कर तो देखो

दो चार पल साथ चल कर तो देखो


गैरों को जो चाहते हो बदलना

अपने को पहले बदल कर तो देखो


मेरे लड्खाड़ने की तुम फ़िक्र छोड़ो

खुद ही गिर रहे हो संभल कर तो देखो


नाकामियों का तुम्हें खौफ़ क्यों है

गर फिर उभरना है ढल कर तो देखो


आशिक़ हो तो फिर मिटो गर्द जैसे

परवाने बन जाओ जल कर देखो


– निहित कौल ‘गर्द’

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