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कुछ

मुख़्तलिफ़ रिश्ते हैं , दिलचस्प हैं, बेजान कुछ थके हारे भी हैं, वाक़िफ भी हैं, अ‍नजान कुछ   कैसे  उम्मीद  करूं  उनसे मैं अपनों पै रहम हम सभी में  छुपे बैठे हैं जब हैवान कुछ   चंद सिक्कों के लिये … Continue reading

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