कुछ ज़ख्म

क्यूँ तुम पे अब भी यूँ मरता है दिल

कुछ ज़ख्म भरने से डरता है दिल

 

जाना कि जब तुम भी महफ़िल में होगे

मन ही ये मन में सँवरता है दिल

 

करूँ जब भी कोशिश मैं तुम को भुलाने की

मुझको ही मेरा अखरता है दिल

 

मोहब्बत करी वो भी कातिल से अपने

जाने ये क्यों ऐसा करता है दिल

 

ख़्वाबों में हम तुम उड़े बादलों में

अब न ज़मीं पे उतरता है दिल

 

खो जाऊँ अब मैं निहाँ तुझ में हो जाऊँ

दिल से गुज़ारिश ये करता है दिल

 

देखा तुझे जब तो रोने लगा गर्द

आँखों में क्यों गर्द भर्ता है दिल

 

– निहित कौल ‘गर्द’

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2 Responses to कुछ ज़ख्म

  1. Vineet KKN 'Panchhi' says:

    Wah Saab Wah.
    Kuch to hai jadu saa; lafzon mein tere,
    Varna yahan kya ye karta hai dil?

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