Author Archives: nihitkaul

याद भी आते नहीं

  कह दिया मैंने की तुम अब याद भी आते नहीं दर्द तो होता है पर हम ज़ख़्म दिखाते नहीं   ज़िंदगी बाज़ार है मिलते हैं बस शिकवे-गिले पूछते हो तुम की क्यूँ बाज़ार हम जाते नहीं   कल जिन्हें … Continue reading

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चलने से पहले

रात यह सुनसान सी आई है दिन ढलने से पहले आ गये मंज़िल पे हम पहला कदम चलने से पहले ख़ौफ़ की आँधी चली, है कांपती हर इक कली, ओड़ती है ओस की चादर वो अब खिलने से पहले क्या … Continue reading

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बाँध दो रोटी

सुनो अब बाँध दो रोटी, मुसाफिर चलने वाला है

– निहित कौल ‘गर्द’ Continue reading

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मुझ को

  हवा सा तू है चारों सू मगर दिखता नहीं मुझ को जो लौटा इब्तिदा पे मैं, मिला फिर तू वहीं मुझ को   करी मेरी खता जो माफ़ फिर काहे की मायूसी तेरी आँखों में क्यूँ छुपति दिखी थोड़ी … Continue reading

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नहीं

Dedicated to this famous ghazal by Bashir Badr   कोई हमसफ़र,कोई हमनशीं,कोई हमनफ़स,कोई हमयकीन, मेरे पास लोग हज़ार थे, मेरे साथ कोई चला नहीं   कई ज़ख़्म जिनकी दवा नहीं, कई जुर्म जिनकी सज़ा नहीं मुझे छोड़ के तू गया … Continue reading

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लेकिन

  करी थी मैंने शब-ओ-रोज़ ये दुआ लेकिन हुआ ना मुझसे मेरा हाल-ए-दिल बयान लेकिन   तेरी ज़ुल्फ़ों की छाओ में मिले दुनिया से नजात ये ख्वाब ही सही है इसका आसरा लेकिन   हुए बिछड़े हमे बरसों तो क्यूँ … Continue reading

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गनीमत है

मौत से डरते हो क्यूँ नासाज़ तबीययत है ज़िन्दगी जितनी मिली उतनी गनीमत है   शहर मे तेरे मुझे तो भीक भी मिलती नहीं भीक है या ये कदंबोसी की कीमत है   बच्चियों को भी ये गिद अब नोच … Continue reading

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