Author Archives: nihitkaul

क्या करूँ

रोज़ घुट घुट के मरूँ या एक दिन जी भर मरूँ क्या करूँ मैं क्या करूँ मैं क्या करूँ मैं क्या करूँ   जल रहा है जो वो मेरा ही तो घर है, या नहीं छोड़कर जिसको गए थे लौट … Continue reading

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सूना सूना दिन

 सूना सूना दिन, सूनी रात आई रे, मोरे कोरे होठों, पे न बात आई रे। भारी पलकें, हल्के-हल्के, ख्वाब देखे हैं, चढ़ती रात पे शाम भी कुछ धूप फेंके है, शाम फिर हारी, फिर से रात आई रे। मन की … Continue reading

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ज़िंदगी की धूप

ज़िंदगी की धूप में जलते रहेंगे कब तलक मोम का है जिस्म पिघलते रहेंगे कब तलक   छोड़ कर मुझको मेरे लौटे सभी वापस वहीं ऐसे वीराने में अब चलते रहेंगे कब तलक   काश उनसे मुदत्तों पहले कहा होता … Continue reading

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नाटक

लो निभाते जा रहे हैं, आज फिर किरदार को, कोई नकली न कहे, नाटक से अपने प्यार को   हाँ ये नाटक ही तो है, मानो बुरा ना बात का, हम तो सब कठपुतलियाँ, किस्सा है सारा हाथ का जो … Continue reading

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#10book

I was posed the #10book challenge by my friend Swathi Prabhu and here is my attempt at listing 10 of the most wonderful books that I have cherished reading (coupled with some associated memories). It was so much fun going … Continue reading

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रास्ते

ढूंढते थे जिसे हम खुद गुमे, लेके हमको वहीं पे आ गए रास्ते, रास्ते, रास्ते, रास्ते, रास्ते, रास्ते, रास्ते कौन सा था शहर ये न थी खबर घर के हम हर कहर से थे बेखबर हाथ थामे हमे ये ले … Continue reading

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The Journey

The first 5 lines of this poem were written many decades ago by my father, Ashok Kaul. I have taken the liberty to extend the thought with a few more. A rose was released From the womb of the seed Into … Continue reading

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