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नहीं

Dedicated to this famous ghazal by Bashir Badr   कोई हमसफ़र,कोई हमनशीं,कोई हमनफ़स,कोई हमयकीन, मेरे पास लोग हज़ार थे, मेरे साथ कोई चला नहीं   कई ज़ख़्म जिनकी दवा नहीं, कई जुर्म जिनकी सज़ा नहीं मुझे छोड़ के तू गया … Continue reading

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लेकिन

  करी थी मैंने शब-ओ-रोज़ ये दुआ लेकिन हुआ ना मुझसे मेरा हाल-ए-दिल बयान लेकिन   तेरी ज़ुल्फ़ों की छाओ में मिले दुनिया से नजात ये ख्वाब ही सही है इसका आसरा लेकिन   हुए बिछड़े हमे बरसों तो क्यूँ … Continue reading

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गनीमत है

मौत से डरते हो क्यूँ नासाज़ तबीययत है ज़िन्दगी जितनी मिली उतनी गनीमत है   शहर मे तेरे मुझे तो भीक भी मिलती नहीं भीक है या ये कदंबोसी की कीमत है   बच्चियों को भी ये गिद अब नोच … Continue reading

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नहीं लगता

  ये कैसा जुर्म है, सज़ा के जो काबिल नहीं लगता करे जो ख़ून अपना क्यों हमे क़ातिल नहीं लगता   वो जिसका हाथ थामे सैंकड़ों मीलों चला दरिया मिला जा कर समुंदर से तो वो साहिल नहीं लगता   … Continue reading

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आ जाओ

  मुझपे थोड़ा सा करो और रहम आ जाओ मेरे महबूब तुम्हें मेरी कसम आ जाओ   तेरे ज़ुल्मों की तो आदत सी हो गयी है हमे आओ लो फ़िर से करो हम पे सितम आ जाओ   तेरी खुशबू … Continue reading

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नहीं हुआ

  वो दिल का दर्द हाजत-ए-ज़ुबान नहीं हुआ वो दर्द-ए-दिल दफ़न रहा फुगाँ नहीं हुआ   सुना है उनके रूठने में प्यार है बहुत पता नहीं वो आज क्यों खफ़ा नहीं हुआ    कहा वो जो मेरे ज़हन में था … Continue reading

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कुछ ज़ख्म

क्यूँ तुम पे अब भी यूँ मरता है दिल कुछ ज़ख्म भरने से डरता है दिल   जाना कि जब तुम भी महफ़िल में होगे मन ही ये मन में सँवरता है दिल   करूँ जब भी कोशिश मैं तुम … Continue reading

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